अक्षरब्रह्मयोगः | Akṣara-Brahma-Yoga
The Yoga of the Imperishable Brahman
य॑ं लब्ध्वा चापरं लाभं॑ मन्यते नाधिकं तत: । यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते
जिस परमात्म-प्राप्तिरूप लाभ को पाकर मनुष्य उससे बढ़कर कोई दूसरा लाभ नहीं मानता; और जिस अवस्था में स्थित योगी भारी-से-भारी दुःख से भी विचलित नहीं होता।
अर्जुन उवाच