उत्पातवर्णनम् (Utpāta-varṇanam) — Catalogue of Portents
सृजते च पुनर्लोकान् नेह विद्यति शाश्वतम् । दो घड़ीतक चिन्तन करनेके बाद वे पुन: इस प्रकार बोले--'राजेन्द्र! इसमें संशय नहीं है कि काल ही इस जगत्का संहार करता है और वही पुनः इन सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि करता है। यहाँ कोई वस्तु सदा रहनेवाली नहीं है ।। ५१ है ।। ज्ञातीनां वै कुरूणां च सम्बन्धिसुहृदां तथा,“राजन! तुम अपने जाति-भाई, कौरवों, सगे-सम्बन्धियों तथा हितैषी-सुहृदोंको धर्मानुकूल मार्गका उपदेश करो; क्योंकि तुम उन सबको रोकनेमें समर्थ हो। जाति-वधको अत्यन्त नीच कर्म बताया गया है। वह मुझे अत्यन्त अप्रिय है। तुम यह अप्रिय कार्य न करो
sṛjate ca punar lokān neha vidyati śāśvatam |
वैशम्पायन बोले— “काल ही पुनः लोकों की सृष्टि करता है; यहाँ कुछ भी शाश्वत नहीं है।” फिर थोड़ी देर विचार करके वे आगे बोले— “राजश्रेष्ठ! इसमें संदेह नहीं—काल ही इस जगत् का संहार करता है और वही इन समस्त लोकों को फिर रचता है। इसलिए अपने जाति-भाइयों—कौरवों—तथा सम्बन्धियों और हितैषी सुहृदों को धर्ममार्ग का उपदेश दो; क्योंकि उन्हें रोकने में तुम समर्थ हो। स्वजन-वध को अत्यन्त नीच कर्म कहा गया है; वह मुझे अत्यन्त अप्रिय है। यह घृणित कार्य मत करो।”
वैशम्पायन उवाच