अक्षरब्रह्मयोग (Akṣara-Brahma-Yoga) — Knowledge of the Imperishable, Prakṛti, and Devotion
सम्बन्ध-- उपर्युक्त प्रकारसे बाह्य विषयभोगोंकोी क्षणिक और दुःखोंका कारण समझकर तथा आसक्तिका त्याग करके जो काम-क्रोधपर विजय प्राप्त कर चुका है; अब ऐसे यांख्ययोगीकी अन्तिम स्थितिका फल-यहित वर्णन किया जाता है-- यो<न्त:सुखो<न््तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । स योगी ब्रह्नानिर्वाणं ब्रह्म भूतो 5धिगच्छति
arjuna uvāca — yo 'ntaḥ-sukho 'ntar-ārāmas tathāntar-jyotir eva yaḥ | sa yogī brahma-nirvāṇaṁ brahma-bhūto 'dhigacchati ||
जिस योगी का सुख भीतर है, जिसका रमण आत्मा में है, और जिसकी ज्ञान-ज्योति भीतर ही प्रकाशित है—वह ब्रह्मरूप होकर ब्रह्मनिर्वाण, अर्थात् ब्रह्म की शान्ति को प्राप्त होता है।
अर्जुन उवाच