Karma-Saṃnyāsa–Karma-Yoga Saṃvāda
Renunciation and the Discipline of Action
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्न॒ मानव: । आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्य न विद्यते
परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करनेवाला, आत्मा में ही तृप्त और आत्मा में ही संतुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं रहता।
अजुन उवाच