कर्मयोग–ज्ञानयज्ञ–अवतारोपदेश
Karma-Yoga, Jñāna-Yajña, and Avatāra Instruction
सम्बन्ध--इस प्रकार मन और इन्द्रियोंको वशर्में करके अनासक्तभावसे इन्द्रियोंद्रारा व्यवहार करनेवाले साधकको युख
जिसने मन और इन्द्रियों को नहीं जीता, उस अयुक्त पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती; और उस अयुक्त के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती। भावना रहित को शान्ति नहीं मिलती, और शान्तिरहित को सुख कहाँ से मिलेगा?
अजुन उवाच