कर्मयोग–ज्ञानयज्ञ–अवतारोपदेश
Karma-Yoga, Jñāna-Yajña, and Avatāra Instruction
सम्बन्ध-- अब दी “लोकोमें स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है” इस दूसरे प्रश्नका उत्तर दिया जाता है-- दुःखेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह: । वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते
दुःखों में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुखों में जो निःस्पृह रहता है, तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं—वह मुनि स्थिरबुद्धि कहलाता है।
अजुन उवाच