Arjuna’s Surrender and Kṛṣṇa’s Instruction on the Imperishable Self, Svadharma, and Karma-Yoga
Bhīṣma-parva 24.0
अन्योन्यं वीक्षमाणानां योधानां भरतर्षभ । कुण्जराणां च नदतां सैन्यानां च प्रहृष्पताम्
हे भरतश्रेष्ठ! एक-दूसरे की ओर देखते हुए योद्धाओं, चिंघाड़ते हुए हाथियों और हर्ष से भरी सेनाओं का तुमुल नाद सर्वत्र फैल रहा था।
संजय उवाच