Sainyavinyāsa–Lakṣaṇa (Disposition of Armies and Battlefield Omens) | सैन्यविन्यास–लक्षणम्
संजय उवाच उभे सेने तुल्यमिवोपयाते उभे व्यूहे हृष्टरूपे नरेन्द्र । उभे चित्र वनराजिप्रकाशे तथैवोभे नागरथाश्वपूर्णे,संजय बोले--नरेन्द्र! दोनों ओरकी सेनाएँ समान रूपसे आगे बढ़ रही थीं। दोनों ओरके व्यूहमें खड़े हुए सैनिक हर्षसे उल्लसित थे। दोनों ही सेनाएँ वनश्रेणियोंके समान आश्चर्यरूप प्रतीत होती थीं और दोनों ही हाथी, रथ एवं घोड़ोंसे भरी हुई थीं
sañjaya uvāca | ubhe sene tulyam ivopayāte ubhe vyūhe hṛṣṭarūpe narendra | ubhe citra-vanarāji-prakāśe tathaivobhe nāga-rathāśva-pūrṇe ||
संजय बोले—नरेन्द्र! दोनों सेनाएँ मानो समान बलवाली होकर आगे बढ़ रही थीं। दोनों व्यूहों में योद्धा हर्षित मुखों से खड़े थे। दोनों ही सेनाएँ विचित्र वन-पंक्तियों के समान अद्भुत दीखती थीं और दोनों ही हाथियों, रथों तथा घोड़ों से परिपूर्ण थीं।
संजय उवाच