हतप्रवीरास्तु वयं निकृत्ताश्व शितै: शरै: । कर्तव्यं नाभिजानीमो निर्जिता: सव्यसाचिना
सव्यसाची अर्जुन ने हम सब पर विजय पा ली थी। उनके तीखे बाणों से हम क्षत-विक्षत हो रहे थे, हमारे प्रमुख वीर मारे जा चुके थे; उस दशा में हमें अपना कर्तव्य ही नहीं सूझता था।
संजय उवाच