इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें संकुलयुद्धाविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ११७ ॥। फल + (0) आजअत+- अष्टादशाधिकशततमोब<् ध्याय: भीष्मका अद्भुत पराक्रम करते हुए पाण्डव-सेनाका भीषण संहार संजय उवाच सम॑ व्यूढेष्वनीकेषु भूयिष्ेष्वनिवर्तिन: । ब्रह्मलोकपरा: सर्वे समपद्यन्त भारत
sañjaya uvāca | samaṁ vyūḍheṣv anīkeṣu bhūyiṣṭheṣv anivartinaḥ | brahmalokaparāḥ sarve samapadyanta bhārata ||
संजय बोले—भरतनन्दन! दोनों पक्षों की सेनाएँ समान रूप से व्यूहबद्ध होकर खड़ी थीं। अधिकांश योद्धा अडिग थे, युद्ध में पीठ न दिखाने वाले थे, और ब्रह्मलोक को ही परम लक्ष्य मानकर रण में प्रवृत्त थे।
संजय उवाच