Nakula’s Declaration and the Uñchavṛtti Brāhmaṇa’s Superior Merit (Āśvamedhika Parva, Adhyāya 92)
धर्मपुत्रमथाक्षिप्य सक्तुप्रस्थेन तेन सः । मुक्त: शापात् ततः क्रोधो धर्मो ह्वासीदू युधिष्ठिर:
धर्मपुत्र युधिष्ठिर पर आक्षेप करते हुए उस सेरभर सत्तू-दान का माहात्म्य बताकर क्रोधरूपधारी धर्म शाप से मुक्त हो गया और वही धर्मराज युधिष्ठिर में स्थित हो गया।
वैशम्पायन उवाच