Adhyāya 90: Babhruvāhana’s Reception and the Commencement of Yudhiṣṭhira’s Aśvamedha
पुत्र उवाच सक्तूनिमान् प्रगृह्य त्वं देहि विप्राय सत्तम । इत्येव सुकृतं मन्ये तस्मादेतत् करोम्यहम्
तब पुत्र ने कहा—“हे सत्पुरुषों में श्रेष्ठ पिताजी! मेरे हिस्से का यह सत्तू लेकर ब्राह्मण को दे दीजिये। मैं इसी को सुकृत मानता हूँ; इसलिए मैं ऐसा कहता हूँ।”
पुत्र उवाच