Janmaveśma-praveśa and Uttarā’s Śaraṇāgati
Entry into the Birth-Chamber and Uttarā’s Appeal
इच्छन्नपि हि लोकांस्त्रीन् जीवयेथा मृतानिमान् । किं पुनर्दयितं जात॑ स्वस्रीयस्यात्मजं मृतम्
तुम चाहो तो मृत्यु के मुख में पड़े हुए इन तीनों लोकों को भी जगा सकते हो; फिर अपने भानजे का यह प्रिय पुत्र, जो मर चुका है, उसे जीवित करना तुम्हारे लिए कौन-सी बड़ी बात है?
वैशम्पायन उवाच