उपहार-विधानम्, यक्षपूजा, रत्ननिध्युद्धारः
Offerings to Tryambaka; Yakṣa honors; Excavation of the Treasure
जयाशिष: प्रह्ृष्टानां नराणां पथि पाण्डव: । प्रत्यगृह्नाद् यथान्यायं यथावत् पुरुषर्षभ:
मार्ग में प्रसन्नचित्त मनुष्य पाण्डव-राज को विजयाशीर्वाद देते थे; और पुरुषश्रेष्ठ युधिष्ठिर यथान्याय सिर झुकाकर उन सत्य वचनों को यथावत् स्वीकार करते थे।
वैशम्पायन उवाच