Brahmā’s Instruction on Brahmacarya, Vānaprastha, and the Aliṅga Path
Ethics of Non-attachment
चर्मवल्कलसंवासी सायं प्रातरुपस्पृशेत् । अरण्यगोचरो नित्य न ग्रामं प्रविशेत् पुन:,वह मृगचर्म अथवा वल्कल-वस्त्र पहने। प्रातः: और सायंकालके समय स्नान करे। सदा वनमें ही रहे। गाँवमें फिर कभी प्रवेश न करे
carmavalkalasaṃvāsī sāyaṃ prātar upaspṛśet | araṇyagocaro nitya na grāmaṃ praviśet punaḥ ||
वह मृगचर्म या वल्कल-वस्त्र धारण करे। प्रातः और सायंकाल स्नान द्वारा शुद्धि करे। सदा वन में ही रहे और फिर कभी गाँव में प्रवेश न करे।
वायुदेव उवाच