
कālacakra-वर्णनम् तथा āśrama-धarma-निरूपणम् (The Wheel of Time and the Norms of the Āśramas)
Upa-parva: Kālacakra–Āśrama-Dharma Upadeśa (Brahmopadeśa episode)
Brahmā describes the kālacakra as an impersonal, unconscious process that binds embodied beings through the mind–sense complex and the great elements, cycling through dualities and embodied conditions: aging, grief, disease, exertion, heat and cold, day and night, hunger and thirst, and the agitation of the guṇas. He states that one who knows the wheel’s true operation—its pravṛtti and nivṛtti—does not succumb to delusion and becomes free from afflictions and moral impurities, attaining a highest goal (paramā gati). The discourse then shifts from cosmological diagnosis to social prescription: the four āśramas are listed, with the gṛhastha presented as their support. A model of disciplined household conduct is outlined—fidelity, restraint, śiṣṭācāra, pañca-mahāyajñas, hospitality, regulated speech and bodily composure, purity, and association with the learned. Finally, Brahmin vocational duties are enumerated (study/teaching, sacrificing/officiating, giving/receiving), with cautions for careful performance and virtues of friendliness, forbearance, and impartiality toward beings; such practice is said to yield auspicious posthumous attainment while maintaining social order.
Chapter Arc: ब्रह्मा गुरु-शिष्य संवाद में देह को ‘कालचक्र’ कहकर खोलते हैं—बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और उनके बन्धन से बना यह चक्र मनुष्य को कैसे घुमाता है। → श्लोकों में देह-कालचक्र के दाँत-दाँत गिनाए जाते हैं: जरा-शोक, व्याधि-व्यसन, देश-काल का दबाव, श्रम-व्यायाम की थकान, अहोरात्र का परिक्षेप, शीत-उष्ण का घेरा, सुख-दुःख का संयोग, क्षुधा-पिपासा की कीलें, तम का कीचड़ और रज का वेग—और साथ ही भय-मोह, काम-क्रोध की पकड़। → निर्णायक वाक्य यह है कि जो मनुष्य इस देहमय कालचक्र की ‘प्रवृत्ति’ और ‘निवृत्ति’ को तत्त्वतः जान लेता है, वह प्राणियों के बीच रहते हुए भी मोह में नहीं पड़ता—ज्ञान ही चक्र से बाहर निकलने का द्वार बनता है। → इसके बाद गृहस्थ-ब्राह्मण के धर्म का व्यावहारिक विधान आता है: स्वधर्म में स्थित रहना, शिष्टाचार, जितेन्द्रियता, अपनी पत्नी में निष्ठा, और श्रद्धा सहित पंचमहायज्ञों का अनुष्ठान—यथाशक्ति शुचिता से करने वाला गृहस्थ स्वर्ग/उन्नति को प्राप्त होता है।
Verse 1
ऑपन-आक्रा बछ। अं पजञज्चचत्वारिशो< ध्याय: देहरूपी कालचक्रका तथा गृहस्थ और ब्रह्मणके धर्मका कथन ब्रह्मोवाच बुद्धिसारं मनःस्तम्भमिन्द्रियग्रामबन्धनम् । महाभूतपरिस्कन्धं निवेशपरिवेशनम्
ब्रह्मा बोले— यह देह एक रचा हुआ निवास है; इसका सार बुद्धि है, इसका स्तम्भ मन है, और इन्द्रियों के समुदाय से यह बँधा हुआ है। यह महाभूतों का पिण्ड है— निवास-स्थान और परिधि-रूप आवरण।
Verse 2
जराशोकसमादविहष्ट व्याधिव्यसनसम्भवम् | देशकालविचारीदं श्रमव्यायामनि:स्वनम्
वायु बोले— यह ध्वनि श्रम और व्यायाम से उठती है; रोग और विपत्ति से उत्पन्न, और जरा, शोक तथा क्लेश से और भी तीव्र होती है। यह देश-काल के अनुसार बदलती है— यह थकान और कठोर परिश्रम का ही निःस्वन है।
Verse 3
अहोरात्रपरिक्षेपं शीतोष्णपरिमण्डलम् | सुखदु:खान्तसंश्लेषं क्षुत्पिपासावकीलकम्
वायु बोले— यह देहधारी जीवन दिन-रात के चक्र से घिरा है, शीत-उष्ण के फेर से आवृत है, सुख-दुःख के संयोग-वियोग से बँधा है, और क्षुधा-पिपासा की बाधा से रुका रहता है।
Verse 4
छायातपविलेखं च निमेषोन्मेषविद्धलम् | घोरमोहजलाकीर्ण वर्तमानमचेतनम्
वायु बोले— यह (संसार-गति) छाया और ताप के फेर से अंकित है, समय के निरन्तर निमेष-उन्मेष से विदीर्ण है, घोर मोह के जल से आप्लावित है, और चेतना के बिना ही बहती चली जाती है।
Verse 5
मासार्धमासगणितं विषमं लोकसंचरम् । तमोनियमपड्कं च रजोवेगप्रवर्तकम्
वायु बोले— यह मास और अर्धमास से गिना जाने वाला, लोकों में विषम रीति से विचरने वाला है। यह तमस के नियम से बना कीचड़ है, और रजोगुण के वेग को प्रवर्तित करने वाला है।
Verse 6
महाहंकारदीप्तं च गुणसंजातवर्तनम् | अरतिग्रहणानीकं॑ शोकसंहारवर्तनम्
वायु ने कहा—यह महान् अहंकार से दहकता है और गुणों से उत्पन्न मार्ग पर चलता है। इसका सैन्य ग्रहणशीलता और अरुचि से बना है, और इसका पथ शोक को समेटकर बढ़ाने वाला है।
Verse 7
क्रियाकारणसंयुक्तं रागविस्तारमायतम् । लोभेप्सापरिविक्षोभ॑ विचित्राज्ञानसम्भवम्
वायु-देव ने कहा—यह क्रिया और कारण से संयुक्त है; राग के द्वारा फैलता और दीर्घ होता जाता है। लोभ और तृष्णा से यह व्याकुल रहता है, और विचित्र, अनेक रूपों वाले अज्ञान से इसकी उत्पत्ति होती है।
Verse 8
भयमोहपरीवारं भूतसम्मोहकारकम् | आनन्दप्रीतिचारं च कामक्रोधपरिग्रहम्
वायु-देव ने कहा—यह भय और मोह से घिरा है और प्राणियों के लिए मोह का कारण बनता है। यह आनन्द और प्रीति के रूप में विचरता है, पर वास्तव में काम और क्रोध से ग्रस्त है।
Verse 9
महदादिविशेषान्तमसक्तं प्रभवाव्ययम् । मनोजवं मनःकान्तं कालचक्रं प्रवर्तते
वायु ने कहा—कालचक्र प्रवर्तित होता रहता है—महत्तत्त्व से आरम्भ होकर विशेष रूपों तक; आसक्ति-रहित, फिर भी सबका उद्गम; अविनाशी। मन के समान वेगवान और मन को मोहित करने वाला यह निरन्तर लुढ़कता हुआ सब प्राणियों और घटनाओं को अपने अनवरत प्रवाह में लिए चलता है।
Verse 10
ब्रह्माजीने कहा--महर्षियो! मनके समान वेगवाला (देहरूपी) मनोरम कालचक्र निरन्तर चल रहा है। यह महत्तत्त्वसे लेकर स्थूल भूतोंतक चौबीस तत्त्वोंसे बना हुआ है। इसकी गति कहीं भी नहीं रुकती। यह संसार-बन्धनका अनिवार्य कारण है। बुढ़ापा और शोक इसे घेरे हुए हैं। यह रोग और दुर्व्यसनोंकी उत्पत्तिका स्थान है। यह देश और कालके अनुसार विचरण करता रहता है। बुद्धि इस काल-चक्रका सार, मन खम्भा और इन्द्रियसमुदाय बन्धन हैं। पठचमहाभूत इसका तना है। अज्ञान ही इसका आवरण है। श्रम तथा व्यायाम इसके शब्द हैं। रात और दिन इस चक्रका संचालन करते हैं। सर्दी और गर्मी इसका घेरा है। सुख और दुःख इसकी सन्धियाँ (जोड़) हैं। भूख और प्यास इसके कीलक तथा धूप और छाया इसकी रेखा हैं। आँखोंके खोलने और मीचनेसे इसकी व्याकुलता (चंचलता) प्रकट होती है। घोर मोहरूपी जल (शोकाश्रु)-से यह व्याप्त रहता है। यह सदा ही गतिशील और अचेतन है। मास और पक्ष आदिके द्वारा इसकी आयुकी गणना की जाती है। यह कभी भी एक-सी अवस्थामें नहीं रहता। ऊपर-नीचे और मध्यवर्ती लोकोंमें सदा चक्कर लगाता रहता है। तमोगुणके वशमें होनेपर इसकी पापपड़कमें प्रवृत्ति होती है और रजोगुणका वेग इसे भिन्न-भिन्न कर्मोमें लगाया करता है। यह महान् दर्पसे उद्दीप्त रहता है। तीनों गुणोंके अनुसार इसकी प्रवृत्ति देखी जाती है। मानसिक चिन्ता ही इस चक्रकी बन्धनपट्टिका है। यह सदा शोक और मृत्युके वशीभूत रहनेवाला तथा क्रिया और कारणसे युक्त है। आसक्ति ही उसका दीर्घ विस्तार (लंबाई-चौड़ाई) है। लोभ और तृष्णा ही इस चक्रको ऊँचे-नीचे स्थानोंमें गिरानेके हेतु हैं। अद्भुत अज्ञान (माया) इसकी उत्पत्तिका कारण है। भय और मोह इसे सब ओरसे घेरे हुए हैं। यह प्राणियोंको मोहमें डालनेवाला, आनन्द और प्रीतिके लिये विचरनेवाला तथा काम और क्रोधका संग्रह करनेवाला है ।। १ -९% || एतद् द्वन्द्समायुक्ते कालचक्रमचेतनम् । विसूजेत् संक्षिपेच्चापि बोधयेत् सामरं जगत्,यह रागदद्वेषादि द्वद्दोंसे युक्त जड देहरूपी कालचक्र ही देवताओंसहित सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि और संहारका कारण है। तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिका भी यही साधन है
ब्रह्माजी ने कहा—यह द्वन्द्वों (राग-द्वेष आदि) से युक्त जड़ देहरूपी कालचक्र ही देवताओं सहित समस्त जगत् की सृष्टि भी करता है और संहार भी। पर यही चक्र, जब यथार्थ रूप से समझ लिया जाता है, जागरण का साधन बनता है—विवेक को प्रेरित करता है और तत्त्वज्ञान की प्राप्ति का उपकरण होता है।
Verse 11
कालचक्रप्रवृत्तिं च निवृत्तिं चैव तत्त्वतः । यस्तु वेद नरो नित्यं न स भूतेषु मुह्ृति,जो मनुष्य इस देहमय कालचक्रकी प्रवृत्ति और निवृत्तिको सदा अच्छी तरह जानता है, वह कभी मोहमें नहीं पड़ता
जो मनुष्य देहधारी जीवन में प्रवृत्त होने वाले कालचक्र की प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों को तत्त्वतः सदा जानता है, वह प्राणियों के बीच कभी मोह में नहीं पड़ता।
Verse 12
विमुक्त: सर्वसंस्कारै: सर्वद्वन्द्रविवर्जित: । विमुक्त: सर्वपापेभ्य: प्राप्नोति परमां गतिम्,वह सम्पूर्ण वासनाओं, सब प्रकारके द्वद्धों और समस्त पापोंसे मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त होता है
जो समस्त संस्कार-वासनाओं से मुक्त, सब द्वन्द्वों से रहित और समस्त पापों से विमुक्त हो जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
Verse 13
गृहस्थो ब्रह्मचारी च वानप्रस्थो5थ भिक्षुक: । चत्वार आश्रमा: प्रोक्ता: सर्वे गार्हस्थ्यमूलका:,ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास--ये चार आश्रम शास्त्रोंमें बताये गये हैं। गृहस्थ आश्रम ही इन सबका मूल है
गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और भिक्षुक (संन्यासी)—ये चार आश्रम शास्त्रों में कहे गए हैं; परन्तु ये सब गृहस्थाश्रम को ही मूल मानते हैं।
Verse 14
यः कश्षिदिह लोके5स्मिन्नागम: परिकीर्तित: । तस्यान्तगमन श्रेय: कीर्तिरेषा सनातनी,इस संसारमें जो कोई भी विधि-निषेधरूप शास्त्र कहा गया है, उसमें पारंगत विद्धान् होना गृहस्थ द्विजोंके लिये उत्तम बात है। इसीसे सनातन यशकी प्राप्ति होती है
इस लोक में जो कोई भी आगम (विधि-निषेध बताने वाला शास्त्र) कहा गया है, उसमें पारंगत होना गृहस्थ द्विजों के लिए परम श्रेय है; इसी से सनातन कीर्ति प्राप्त होती है।
Verse 15
संस्कारै: संस्कृत: पूर्व यथावच्चरितव्रत: । जातौ गुणविशिष्टायां समावर्तेत तत्त्ववित्,पहले सब प्रकारके संस्कारोंसे सम्पन्न होकर वेदोक्त विधिसे अध्ययन करते हुए ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करना चाहिये। तत्पश्चात् तत्त्ववेत्ताको उचित है कि वह समावर्तन- संस्कार करके उत्तम गुणोंसे युक्त कुलमें विवाह करे
पहले विधिपूर्वक संस्कारों से संस्कृत होकर, वेदोक्त नियम से अध्ययन करते हुए ब्रह्मचर्य-व्रत का यथावत् पालन करना चाहिए। तत्पश्चात् तत्त्ववेत्ता को समावर्तन-संस्कार करके उत्तम गुणों से युक्त कुल में विवाह कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना चाहिए।
Verse 16
स्वदारनिरतो नित्यं शिष्टाचारो जितेन्द्रिय: । पज्चभिश्न महायज्ञै: श्रद्दधानो यजेदिह,अपनी ही स्त्रीपर प्रेम रखना, सदा सत्पुरुषोंक आचारका पालन करना और जितेन्द्रिय होना गृहस्थके लिये परम आवश्यक है। इस आश्रममें उसे श्रद्धापूर्वक पठचमहायज्ञोंके द्वारा देवता आदिका यजन करना चाहिये
वायु ने कहा—गृहस्थ को सदा अपनी धर्मपत्नी में अनुरक्त रहना चाहिए, शिष्ट और सत्पुरुषों के आचार का पालन करना चाहिए तथा इन्द्रियों को वश में रखना चाहिए। इस आश्रम में उसे श्रद्धापूर्वक पञ्चमहायज्ञों द्वारा देवताओं और समस्त प्राणियों का यजन-पूजन कर धर्म की मर्यादा को स्थिर रखना चाहिए।
Verse 17
देवतातिथिशिष्टाशी निरतो वेदकर्मसु । इज्याप्रदानयुक्तश्चन यथाशक्ति यथासुखम्,गृहस्थको उचित है कि वह देवता और अतिथियोंको भोजन करानेके बाद बचे हुए अन्नका स्वयं आहार करे। वेदोक्त कर्मोंके अनुष्ठानमें संलग्न रहे। अपनी शक्तिके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ करे और दान दे
वायु ने कहा—गृहस्थ को चाहिए कि देवताओं के लिए आहुति देकर और अतिथि को भोजन कराकर जो अन्न शेष रहे, वही स्वयं ग्रहण करे। वह वेदोक्त कर्मों में निरत रहे और अपनी शक्ति के अनुसार प्रसन्नचित्त होकर यज्ञ करे तथा दान दे।
Verse 18
न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलो मुनि: । न च वागड्भचपल इति शिष्टस्य गोचर:,मननशील गृहस्थको चाहिये कि हाथ, पैर, नेत्र, वाणी तथा शरीरके द्वारा होनेवाली चपलताका परित्याग करे अर्थात् इनके द्वारा कोई अनुचित कार्य न होने दे। यही सत्पुरुषोंका बर्ताव (शिष्टाचार) है
मननशील गृहस्थ को चाहिए कि हाथ-पैर, नेत्र, वाणी और शरीर की चपलता का त्याग करे—अर्थात इनके द्वारा कोई अनुचित कर्म न होने दे। यही शिष्ट पुरुषों का आचरण कहा गया है।
Verse 19
नित्यं यज्ञोपवीती स्याच्छुक्लवासा: शुचिव्रत: । नियतो यमदानाभ्यां सदा शिष्टैश्न संविशेत्,सदा यज्ञोपवीत धारण किये रहे, स्वच्छ वस्त्र पहने, उत्तम व्रतका पालन करे, शौच- संतोष आदि नियमों और सत्य-अहिंसा आदि यमोंके पालनपूर्वक यथाशक्ति दान करता रहे तथा सदा शिष्ट पुरुषोंके साथ निवास करे
वायु ने कहा—मनुष्य सदा यज्ञोपवीत धारण करे, स्वच्छ श्वेत वस्त्र पहने और शुद्ध, संयमित व्रत का पालन करे। यमों (सत्य, अहिंसा आदि) तथा यथाशक्ति दान के द्वारा आत्मसंयमी रहे और सदा शिष्ट पुरुषों की संगति में निवास करे, असंस्कृत जनों के बीच न रहे।
Verse 20
जितशिक्षोदरो मैत्र: शिष्टाचारसमन्वित: । वैणवीं धारयेद् यष्टिं सोदक॑ च कमण्डलुम्,शिष्टाचारका पालन करते हुए जिह्नला और उपस्थको काबूमें रखे। सबके साथ मित्रताका बर्ताव करे। बाँसकी छड़ी और जलसे भरा हुआ कमण्डलु सदा साथ रखे
वायु ने कहा—शिष्टाचार से युक्त होकर वह जिह्वा और उदर के वेग को जीते, सबके प्रति मैत्रीभाव रखे। वह बाँस की छड़ी और जल से भरा कमण्डलु धारण करे।
Verse 21
(त्रीणि धारयते नित्यं कमण्डलुमतन्द्रित: । एकमाचमनार्थाय एकं॑ वै पादधावनम् । एकं शौचविधानार्थमित्येतत् त्रितयं तथा ।॥) वह आलस्य छोड़कर सदा तीन कमण्डलु धारण करे। एक आचमनके लिये, दूसरा पैर धोनेके लिये और तीसरा शौच-सम्पादनके लिये। इस प्रकार कमण्डलु धारणके ये तीन प्रयोजन हैं ।। अधीत्याध्यापनं कुर्यात् तथा यजनयाजने । दान॑ प्रतिग्रहं वापि षड्गुणां वृत्तिमाचरेत्,ब्राह्मणफो अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन और दान तथा प्रतिग्रह--इन छः: वृत्तियोंका आश्रय लेना चाहिये
वायुदेव बोले—मनुष्य को आलस्य त्यागकर सदा तीन कमण्डलु धारण करने चाहिए। एक आचमन के लिए, दूसरा पाद-प्रक्षालन के लिए और तीसरा शौच-सम्पादन के लिए—कमण्डलु धारण करने के ये तीन प्रयोजन हैं। इसी प्रकार ब्राह्मण को छः वृत्तियों का आचरण करना चाहिए—अध्ययन और अध्यापन, यजन और याजन, दान और प्रतिग्रह।
Verse 22
त्रीणि कर्माणि जानीत ब्राह्मणानां तु जीविका । याजनाध्यापने चोभे शुद्धाच्चापि प्रतिग्रह:,इनमेंसे तीन कर्म--याजन (यज्ञ कराना), अध्यापन (पढ़ाना) और श्रेष्ठ पुरुषोंसे दान लेना--ये ब्राह्मणकी जीविकाके साधन हैं
वायु बोले—ब्राह्मणों की जीविका के लिए तीन धर्म्य कर्म जानो: याजन (दूसरों के लिए यज्ञ कराना), अध्यापन (शास्त्र पढ़ाना) और शुद्ध प्रतिग्रह (धर्मपूर्वक दिया गया दान ग्रहण करना)।
Verse 23
अथ शेषाणि चान्यानि त्रीणि कर्माणि यानि तु । दानमध्ययन यज्ञो धर्मयुक्तानि तानि तु,शेष तीन कर्म-दान, अध्ययन तथा यज्ञानुष्ठान करना-ये धर्मोपार्जनके लिये हैं
वायु बोले—अब शेष तीन कर्म—दान, अध्ययन और यज्ञ का अनुष्ठान—ये धर्मयुक्त हैं; धर्म के उपार्जन और वृद्धि के लिए किए जाते हैं।
Verse 24
तेष्वप्रमाद॑ कुर्वीत त्रिषु कर्मसु धर्मवित् दान्तो मैत्र: क्षमायुक्त: सर्वभूतसमो मुनि:,धर्मज्ञ ब्राह्मगको इनके पालनमें कभी प्रमाद नहीं करना चाहिये। इन्द्रियसंयमी, मित्रभावसे युक्त, क्षमावान, सब प्राणियोंके प्रति समानभाव रखनेवाला, मननशील, उत्तम व्रतका पालन करनेवाला और पवित्रतासे रहनेवाला गृहस्थ ब्राह्मण सदा सावधान रहकर अपनी शक्तिके अनुसार यदि उपर्युका नियमोंका पालन करता है तो वह स्वर्गलोकको जीत लेता है
वायु बोले—धर्मवित् पुरुष को उन तीन कर्मों के विषय में कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए। इन्द्रियसंयमी, मैत्रीभावयुक्त, क्षमावान और समस्त प्राणियों के प्रति समदृष्टि रखने वाला मननशील जन सदा सावधान रहे।
Verse 25
सर्वमेतद् यथाशक्ति विप्रो निर्वर्तयन् शुचि: । एवं युक्तो जयेत् स्वर्ग गृहस्थ: संशितव्रत:,धर्मज्ञ ब्राह्मगको इनके पालनमें कभी प्रमाद नहीं करना चाहिये। इन्द्रियसंयमी, मित्रभावसे युक्त, क्षमावान, सब प्राणियोंके प्रति समानभाव रखनेवाला, मननशील, उत्तम व्रतका पालन करनेवाला और पवित्रतासे रहनेवाला गृहस्थ ब्राह्मण सदा सावधान रहकर अपनी शक्तिके अनुसार यदि उपर्युका नियमोंका पालन करता है तो वह स्वर्गलोकको जीत लेता है
वायु बोले—शुचि ब्राह्मण यदि अपनी शक्ति के अनुसार इन सबका निर्वाह करता है, और इस प्रकार संयम व सदाचार से युक्त होकर, गृहस्थ-आश्रम में दृढ़ व्रत वाला रहता है, तो वह स्वर्गलोक को जीत लेता है।
Verse 44
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के आश्वमेधिकपर्व के अंतर्गत अनुगीतापर्व में गुरु-शिष्य-संवादविषयक चवालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 45
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे पज्चचत्वारिंशो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
इति श्रीमहाभारत के आश्वमेधिक पर्व में अनुगीतापर्व के गुरु-शिष्य-संवाद का पैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ। इस प्रकार गुरु-शिष्य-संवादविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
The chapter frames the dilemma of agency under constraint: how to live responsibly when embodied life is driven by impersonal time, sensory binding, and dualities; the proposed resolution is disciplined conduct grounded in accurate knowledge of kāla’s operation.
Understanding the kālacakra’s pravṛtti and nivṛtti reduces delusion and affliction; liberation-oriented clarity is paired with practical ethics—restraint, purity, hospitality, and regulated livelihood—so that knowledge becomes socially stabilizing conduct.
Yes: the text asserts that the knower of time’s true operation does not become deluded among beings and, being freed from afflictions and moral impurities, attains the “highest goal” (paramā gati); additionally, disciplined gṛhastha practice is linked to attaining svarga and auspicious outcomes.