Ahaṃkāra as the Second Creation: Brahmā’s Cosmological Instruction (अहंकार-प्राधान्येन सृष्टिवर्णनम्)
यह अहंकार भूतादि विकारोंका कारण है, इसलिये वैकारिक माना गया है। यह रजोगुणका स्वरूप है, इसलिये तैजस् है। इसका आधार चेतन आत्मा है। सारी प्रजाकी सृष्टि इसीसे होती है, इसलिये इसको प्रजापति कहते हैं ।।
devānāṃ prabhavo devo manasaś ca trilokakṛt | aham ity eva tat sarvam abhimantā sa ucyate ||
वायु ने कहा—वही देव देवताओं का भी उद्गम है; वही मन का स्वामी और त्रिलोकी का कर्ता है। जो ‘अहम्’—‘मैं’—के भाव से सबको अपना मान लेता है, वही अहंकार कहलाता है।
वायुदेव उवाच