Adhyāya 34: Kṣetrajña-Lakṣaṇa and the Araṇi Metaphor
Mind–Intellect Allegory
श्रीभगवानुवाच ततस्तु तस्या ब्राह्माण्या मति: क्षेत्रज्ञसंक्षये । क्षेत्रज्ञानेन परत: क्षेत्रज्ञेभ्य: प्रवर्तते
श्रीभगवान् बोले—पार्थ! तत्पश्चात् उस ब्राह्मणी की बुद्धि, जो क्षेत्रज्ञ के विषय में संशययुक्त थी, क्षेत्र-ज्ञान से परे स्थित क्षेत्रज्ञों की ओर प्रवृत्त हो गई।
ब्राह्मण उवाच