जनक–ब्राह्मणसंवादः
Viṣaya, Mamatva, and Self-Mastery
त्वमस्य ब्रह्मुलाभस्य दुर्वारस्यानिवर्तिन: । सत्त्वनेमिनिरुद्धस्य चक्रस्यैक: प्रवर्तक:
“अब मुझे निश्चय हो गया है कि इस संसार में ब्रह्म-प्राप्ति रूप, दुर्वार और अनिवर्तनीय—सत्त्व-गुण रूप नेमि से घिरे हुए—उस चक्र को चलाने वाले आप ही एकमात्र प्रवर्तक हैं।”
जनक उवाच