Adhyaya 23
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 2324 Verses

Adhyaya 23

Pañcahotṛ-Vidhāna and the Dispute of the Five Vāyus (पञ्चहोतृविधानम् — पञ्चवायूनां श्रेष्ठत्वविवादः)

Upa-parva: Āśvamedhika-parva — Prāṇa-Vāyu Pañcahotṛ-Dialogues (Pañcavāyu-Itihāsa Episode)

A brāhmaṇa introduces an ancient itihāsa explaining the “five hotṛs” as the five vital airs: prāṇa, apāna, vyāna, udāna, and samāna. A brāhmaṇī queries how this fivefold model relates to an earlier view of seven hotṛs, prompting a clarification of the five as a ‘higher’ (para) formulation. The brāhmaṇa outlines a sequential dependence among the vāyus (prāṇa conditioning apāna, apāna conditioning vyāna, and so on). The vāyus then approach Prajāpati/Brahmā to ask who is eldest and thus श्रेष्ठ (best). Brahmā defines the श्रेष्ठ as that principle upon whose dissolution all others collapse and upon whose activity they resume. Each vāyu, in turn, claims superiority by enacting a temporary withdrawal and return, while the others counter-argue that it remains under another’s control. The dispute culminates with Brahmā’s adjudication: all are “best” in their own domain, mutually characterized, and mutually protective; the five are differentiated expressions of a single underlying self-principle that becomes manifold. The chapter closes with an injunction toward reciprocal support and well-being (svasti), emphasizing cooperation over rivalry.

Chapter Arc: अनुगीता के ब्राह्मण-गीत में पंच प्राणों (प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान) को ‘पंच होतृ’ कहकर उनकी श्रेष्ठता का विधान होता है—मानो देह-यज्ञ के पाँच पुरोहित एक साथ सभा में उपस्थित हों। → पाँचों वायुओं में श्रेष्ठता का विवाद उठता है। प्रत्येक अपने-अपने सामर्थ्य का दावा करता है और प्रमाण देने के लिए ‘प्रलीन’ होकर दिखाता है कि उसके लय होते ही अन्य प्राण भी लय को प्राप्त होते हैं, और उसके पुनः प्रवर्तन से सब फिर चल पड़ते हैं। → प्राण और अपान (और क्रमशः अन्य) अपने-अपने ‘मयि प्रलीने…’ वाले दावे के साथ देह-व्यवस्था को ठहराकर दिखाते हैं; विवाद तीव्र होता है कि कौन सर्वव्यापक है, कौन अधीन है, कौन प्रधान। → प्रजापति समवेत प्राणों को उपदेश देते हैं—‘सर्वे स्वविषये श्रेष्ठाः’—सब अपने-अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ हैं और सबका धर्म परस्पर-आश्रित है। फिर सिद्धान्त उद्घोषित होता है: एक ही वायु स्थिर-अस्थिर रूपों में विशेष भेद से पाँच कहलाती है; अतः अहंकार-जन्य प्रतियोगिता त्याज्य है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्ााभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २२ ॥। - इस श्लोकका सारांश इस प्रकार समझना चाहिये--पहले आत्मा मनको उच्चारण करनेके लिये प्रेरित करता है

ब्राह्मण ने कहा—प्रिये! यहाँ भी एक प्राचीन दृष्टान्त दिया जाता है। मैं इस प्रसंग में पञ्चहोताओं के यज्ञ का जैसा विधान है, वैसा ही बतलाता हूँ।

Verse 2

प्राणापानावुदानश्च॒ समानो व्यान एव च | पज्चहोतुस्तथैतान्‌ वै परं भावं विदुर्बुधा:

ब्राह्मण ने कहा—प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान—ये पाँच प्राण-वायुएँ ही ‘पञ्च-होता’ कही जाती हैं। विद्वान् इन्हें परम भाव से जानकर अन्तःयज्ञ को पहचानते हैं; संयमित प्राण ही आत्मविजय और आध्यात्मिक आरोहण के साधन बनते हैं।

Verse 3

प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान--ये पाँचों प्राण पाँच होता हैं। विद्वान्‌ पुरुष इन्हें सबसे श्रेष्ठ मानते हैं ।।

ब्राह्मणी बोली—नाथ! पहले मेरी यह धारणा थी कि स्वभावतः सात होता हैं; पर अब आपके वचनों से पाँच होताओं का ज्ञान हुआ। अतः ये पाँच होता किस प्रकार हैं? कृपा करके इनकी श्रेष्ठता का वर्णन कीजिए।

Verse 4

ब्राह्मण उवाच प्राणेन सम्भूतो वायुरपानो जायते ततः । अपाने सम्भूतो वायुस्ततो व्यान: प्रवर्तते

ब्राह्मण ने कहा—प्राण से पुष्ट होकर वायु अपान रूप में उत्पन्न होता है; और अपान से पुष्ट होकर वही वायु व्यान रूप में प्रवृत्त होता है। इस प्रकार एक-एक प्राण दूसरे के आश्रय से प्रकट होता है।

Verse 5

व्यानेन सम्भृतो वायुस्ततोदान: प्रवर्तते । उदाने सम्भूतो वायु: समानो नाम जायते

ब्राह्मण ने कहा—व्यान से पुष्ट होकर वही वायु उदान रूप में प्रवृत्त होता है; और उदान से पुष्ट होकर वही वायु ‘समान’ नाम से उत्पन्न होता है। इस प्रकार क्रमशः पोषित होकर प्राण-वायुओं के भेद प्रकट होते हैं। तब वे पाँचों वायु पितामह ब्रह्मा के पास गए और बोले—“भगवन्! हममें जो श्रेष्ठ हो उसका नाम बताइए; वही हम सबका प्रधान हो।”

Verse 6

तेडपृच्छन्त पुरा सन्त: पूर्वजातं पितामहम्‌ | यो नः श्रेष्ठस्तमाचक्ष्व स न: श्रेष्ठो भविष्यति

वे सत्पुरुष प्राचीन काल में प्रथमज पितामह से पूछने लगे—“हममें जो श्रेष्ठ हो, उसका नाम बताइए; वही हम सबमें श्रेष्ठ होकर हमारा अग्रणी बने।”

Verse 7

ब्रह्मोवाच यस्मिन्‌ प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणा: प्राणभूतां शरीरे । यस्मिन्‌ प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति स वै श्रेष्ठो गच्छत यत्र काम:

ब्रह्मा ने कहा—हे प्राणधारियों! तुम सब जो जीवों के शरीर में स्थित हो, तुममें वही तत्त्व श्रेष्ठ है जिसके लीन हो जाने पर सब प्राण लय को प्राप्त हो जाते हैं और जिसके प्रवृत्त होने पर वे फिर चलने लगते हैं। अब जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, जाओ।

Verse 8

प्राण उवाच मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणा: प्राणभूतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो हाहं पश्यत मां प्रलीनम्‌

प्राण ने कहा—मेरे लीन होने पर प्राणियों के शरीर में स्थित सब प्राण लय को प्राप्त हो जाते हैं, और मेरे संचरण करने पर वे सब फिर संचार करने लगते हैं। इसलिए मैं ही श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ।

Verse 9

ब्राह्मण उवाच प्राण: प्रालीयत तत: पुनश्न प्रचचार ह । समानश्षाप्युदानश्व वचोडब्रूतां पुन: शुभे

ब्राह्मण ने कहा—हे शुभे! ऐसा कहकर प्राण कुछ समय के लिए लीन हो गया और फिर पुनः चलने लगा। तब समान और उदान ने उससे फिर कहा।

Verse 10

न त्वं सर्वमिदं व्याप्प तिष्ठतीह यथा वयम्‌ | नत्वं श्रेष्ठो हि न: प्राण अपानो हि वशे तव । प्रचचार पुन: प्राणस्तमपानो5भ्यभाषत

ब्राह्मण ने कहा—प्राण! जैसे हम इस समस्त शरीर में व्याप्त होकर स्थित रहते हैं, वैसे तुम नहीं रहते। इसलिए तुम हमसे श्रेष्ठ नहीं हो। वास्तव में केवल अपान ही तुम्हारे वश में है; अतः तुम्हारे लीन होने से हमें कोई हानि नहीं। तब प्राण फिर पूर्ववत् चलने लगा। इसके बाद अपान बोला।

Verse 11

अपान उवाच मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणा: प्राणभूतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो हाहं पश्यत मां प्रलीनम्‌

अपान ने कहा—मेरे लीन होने पर प्राणियों के शरीर में स्थित सब प्राण लय को प्राप्त हो जाते हैं, और मेरे संचरण करने पर वे सब फिर संचार करने लगते हैं। इसलिए मैं ही श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ; मेरे लय के साथ शेष भी अव्यक्त हो जाएँगे।

Verse 12

ब्राह्मण उवाच व्यानश्व तमुदानश्व भाषमाणमथोचतु: । अपान न व्वं श्रेष्ठोडईसि प्राणो हि वशगस्तव

ब्राह्मण बोले—तब व्यान और उदान ने, ऐसा कह रहे अपान से कहा—“अपान! तुम हमसे श्रेष्ठ नहीं हो; केवल प्राण ही तुम्हारे वश में है, इसलिए तुम श्रेष्ठ नहीं हो सकते।”

Verse 13

अपान: प्रचचाराथ व्यानस्तं पुनरब्रवीत्‌ । श्रेष्ठो5हमस्मि सर्वेषां श्रूयतां येन हेतुना

यह सुनकर अपान भी पहले की तरह चलने लगा। तब व्यान ने उससे फिर कहा—“मैं ही सबमें श्रेष्ठ हूँ; जिस कारण से मेरी श्रेष्ठता सिद्ध है, वह सुनो।”

Verse 14

मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणा: प्राणभूतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो हाहं पश्यत मां प्रलीनम्‌

“मेरे लीन होने पर प्राणियों के शरीर में स्थित सभी प्राण भी लीन हो जाते हैं; और मेरे चलने पर वे सब फिर चलने लगते हैं। इसलिए मैं ही श्रेष्ठ हूँ। देखो—अब मैं लीन हो रहा हूँ; तब तुम्हारा भी लय हो जाएगा।”

Verse 15

ब्राह्मण उवाच प्रालीयत ततो व्यान: पुनश्च प्रचचार ह । प्राणापानावुदानश्न॒ समानश्च तमब्रुवन्‌ । न त्वं श्रेष्ठोडसि नो व्यान समानस्तु वशे तव

ब्राह्मण बोले—तब व्यान कुछ समय के लिए लीन हो गया, फिर चलने लगा। तब प्राण, अपान, उदान और समान ने उससे कहा—“व्यान! तुम हमसे श्रेष्ठ नहीं हो; केवल समान वायु ही तुम्हारे वश में है।”

Verse 16

प्रचचार पुनर्व्यान: समान: पुनरब्रवीत्‌ श्रेष्ठो5हमस्मि सर्वेषां श्रूयतां येन हेतुना,यह सुनकर व्यान पूर्ववत्‌ चलने लगा। तब समानने पुनः कहा--“मैं जिस कारणसे सबमें श्रेष्ठ हूँ, वह बताता हूँ सुनो

यह सुनकर व्यान फिर पहले की तरह चलने लगा। तब समान ने फिर कहा—“मैं जिस कारण से सबमें श्रेष्ठ हूँ, वह सुनो।”

Verse 17

मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणा: प्राणभूतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो हाहं पश्यत मां प्रलीनम्‌

ब्राह्मण ने कहा—“जब मैं अपने में लीन हो जाता हूँ, तब देहधारियों के शरीर में स्थित जीवन-रूप सब प्राण भी लय को प्राप्त हो जाते हैं। और जब मैं फिर फैलकर संचरित होता हूँ, तब वे सब पुनः प्रवृत्त हो उठते हैं। इसलिए मैं ही श्रेष्ठ हूँ। देखो—अब मैं लीन हो रहा हूँ (और मेरे लय के साथ तुम्हारा भी लय हो जाएगा)।”

Verse 18

(ब्राह्मण उवाच ततः समान: प्रालिल्ये पुनश्न प्रचचार ह | प्राणापानाबुदानश्च व्यानश्वैव तमब्रुवन्‌ ।।

ब्राह्मण कहते हैं—यह कहकर समान कुछ समय के लिए लीन हो गया, फिर पहले की भाँति चलने लगा। तब प्राण, अपान, उदान और व्यान ने उससे कहा—“समान! तुम हमसे श्रेष्ठ नहीं हो; केवल व्यान ही तुम्हारे वश में है।” यह सुनकर समान पूर्ववत् चलता रहा। तब उदान ने उससे कहा—“मैं ही सबमें श्रेष्ठ हूँ; इसका कारण सुनो।”

Verse 19

मयि प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणा: प्राणभूतां शरीरे । मयि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति श्रेष्ठो हाहं पश्यत मां प्रलीनम्‌

ब्राह्मण ने कहा—“मेरे लीन होने पर देहधारियों के शरीर में जीवन-रूप सब प्राण भी लय को प्राप्त हो जाते हैं। और मेरे पुनः संचरित होने पर वे सब फिर चलने लगते हैं। इसलिए मैं ही श्रेष्ठ हूँ। देखो—अब मैं लीन हो रहा हूँ (और फिर तुम्हारा भी लय हो जाएगा)।”

Verse 20

ततः प्रालीयतोदान: पुनश्च प्रचचार ह । प्राणापानौ समाननश्च व्यानश्वैव तमब्रुवन्‌ । उदान न व्वं श्रेष्ठो$सि व्यान एव वशे तव

तब उदान कुछ समय के लिए लीन हो गया और फिर चलने लगा। तब प्राण, अपान, समान और व्यान ने उससे कहा—“उदान! तुम हमसे श्रेष्ठ नहीं हो; केवल व्यान ही तुम्हारे वश में है।”

Verse 21

ब्राह्मण उवाच ततस्तानब्रवीद्‌ ब्रह्मा समवेतान्‌ प्रजापति: । सर्वे श्रेष्ठा न वा श्रेष्ठा: सर्वे चान्योन्य धर्मिण:

ब्राह्मण कहते हैं—तदनन्तर वे सब प्राण प्रजापति ब्रह्मा के पास एकत्र हुए। तब प्रजापति ब्रह्मा ने उनसे कहा—“तुम सब श्रेष्ठ हो—अथवा तुममें से कोई भी श्रेष्ठ नहीं। क्योंकि तुम सबका धारण-रूप धर्म एक-दूसरे पर अवलम्बित है।”

Verse 22

सर्वे स्वविषये श्रेष्ठा: सर्वे चान्योन्यधर्मिण: । इति तानब्रवीत्‌ सर्वान्‌ समवेतान्‌ प्रजापति:

प्रजापति ने वहाँ एकत्र हुए सब प्राणों से कहा—“तुम सब अपने-अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ हो, और तुम सबका धर्म एक-दूसरे पर अवलम्बित है।”

Verse 23

एक: स्थिरश्नास्थिरश्न॒ विशेषात्‌ पज्च वायव: । एक एव ममैवात्मा बहुधाप्युपचीयते

ब्राह्मण ने कहा—“वायु एक ही है, पर वह स्थिर और अस्थिर रूप में प्रकट होती है। उसीके विशेष भेद से पाँच वायु कहे जाते हैं। इसी प्रकार मेरा एक ही आत्मा अनेक रूपों में बढ़ता-फैलता प्रतीत होता है।”

Verse 24

परस्परस्य सुहृदो भावयन्त: परस्परम्‌ | स्वस्ति व्रजत भद्रं वो धारयध्वं परस्परम्‌

ब्राह्मण ने कहा—“तुम्हारा कल्याण हो। कुशलपूर्वक जाओ। परस्पर सुहृद् बनकर एक-दूसरे की उन्नति में सहायता करो और एक-दूसरे को धारण करते रहो।”

Frequently Asked Questions

A rivalry dilemma framed as precedence: whether a single function can claim absolute श्रेष्ठत्व when the system’s continuity depends on coordinated, reciprocal operation.

Excellence is contextual: each component is indispensable within its sphere, and stability arises from mutual support (अन्योन्यधर्म) rather than dominance.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-teaching functions as practical soteriology by presenting unity-in-diversity and cooperation as the interpretive key to embodied life and disciplined conduct.