सप्तहोतृ-विधानम् एवं इन्द्रिय–मनःसंवादः
The Seven Hotṛs and the Debate of Senses and Mind
ब्राह्मण उवाच गुणाज्ञानमविज्ञानं गुणज्ञानमभिज्ञता | परस्परं गुणानेते नाभिजानन्ति कह्िचित्
brāhmaṇa uvāca | guṇājñānam avijñānaṃ guṇajñānam abhijñatā | parasparaṃ guṇān ete nābhijānanti kaścit ||
ब्राह्मण ने कहा—गुणों को न जानना ही अज्ञान है और गुणों को जानना ही सच्ची अभिज्ञता। परंतु ये (इन्द्रिय-आदि) परस्पर एक-दूसरे के गुणों को नहीं जान पाते; इनमें से कोई भी दूसरे को पूर्णतः नहीं समझता।
ब्राह्मण उवाच