Dehānta (Cyavana) and Upapatti: Kāśyapa’s Questions and the Siddha’s Account of Death, Pain, and Karmic Re-embodiment
न च तत्रापि संतोषो दृष्टवा दीप्ततरां श्रियम् इत्येता गतय: सर्वा: पृथक्ते समुदीरिता:
वहाँ भी दूसरों की अधिक दीप्तिमान् श्री-सम्पदा देखकर संतोष नहीं होता। इस प्रकार जीव की ये सब गतियाँ मैंने तुम्हारे सामने अलग-अलग कह दीं।
सिद्ध उवाच