Vāsudeva’s Upadeśa: The Inner Enemy and the Indra–Vṛtra Precedent (आत्मशत्रु-बोधः; इन्द्र-वृत्रोपाख्यानम्)
स वध्यमानो वज्ेण तस्मिन्नमिततेजसा,इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि कृष्णधर्मसंवादे एकादशो< ध्याय:
sa vadhyamāno vajreṇa tasminn amitatejasā | iti śrīmahābhārate āśvamedhike parvaṇi aśvamedhaparvaṇi kṛṣṇadharmasaṃvāde ekādaśo 'dhyāyaḥ ||
उस अमिततेजस्वी के वज्र से आहत होकर वह मारा जा रहा था। इस प्रकार श्रीमहाभारत के आश्वमेधिक पर्व के अश्वमेध-प्रकरण में कृष्ण-धर्म संवाद का ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
वायुदेव उवाच