
नारदेन धृतराष्ट्रगतिवर्णनम् | Nārada’s Account of Dhṛtarāṣṭra’s Future Course
Upa-parva: Nārada–Śatayūpa-saṃvāda (Account of Dhṛtarāṣṭra’s post-austerity destiny)
Vaiśaṃpāyana reports that learned Brahmins approve Nārada’s words, after which the royal sage Śatayūpa addresses Nārada with a focused request: although Nārada has described certain kings attaining Indra’s world, Dhṛtarāṣṭra’s specific loka and the timing and character of his destiny have not been detailed. Śatayūpa acknowledges Nārada’s comprehensive vision and divine sight, asking for a precise account. Nārada responds in an assembly of the virtuous, stating that he went to Śakra’s court and there saw King Pāṇḍu; in that context he heard Indra speak about Dhṛtarāṣṭra’s severe austerities and that three years remain of his allotted maximum lifespan. Thereafter, Dhṛtarāṣṭra—accompanied by Gāndhārī—will enjoy honor in Kubera’s residence, traveling by a wish-moving aerial conveyance, adorned with divine ornaments, his impurities burned away by tapas. He will move freely among the worlds of devas, gandharvas, and rākṣasas. Nārada frames this as a “divine secret” shared out of goodwill; the listeners become pleased, and the sages depart as they wish, established in accomplished spiritual trajectories.
Chapter Arc: वन के एकांत में धृतराष्ट्र के तप और मनःस्थिति का समाचार लेने महर्षि व्यास का आगमन होता है; उनके मुख से कुशल-प्रश्नों की धारा बहती है—क्या शोक शान्त हुआ, क्या वनवास में चित्त प्रसन्न है? → व्यास धृतराष्ट्र के भीतर छिपे पुत्र-विनाशजन्य शोक, अपराध-बोध और वैराग्य की कसौटी पर प्रश्न रखते हैं; साथ ही कुन्ती की गुरु-शुश्रूषा और युधिष्ठिर-विदुर की धर्ममय प्रकृति का स्मरण कराते हैं, मानो यह जाँच रहे हों कि कुरुवंश का शेष जीवन अब धर्म के पथ पर स्थिर है या नहीं। → व्यास विदुर के रहस्य को उद्घाटित करते हैं—माण्डव्य-शाप से स्वयं धर्मदेव विदुर-रूप में अवतीर्ण हुए; और उसी धर्म-तत्त्व के योगबल से युधिष्ठिर का जन्म हुआ—यह उद्घोष धृतराष्ट्र के सामने समस्त घटनाओं को ‘धर्म’ की व्यापक योजना में रख देता है। → व्यास धृतराष्ट्र को आश्वस्त करते हैं कि वे शीघ्र ही उसे श्रेय (कल्याण) से जोड़ेंगे और संशय-च्छेदन हेतु स्वयं उपस्थित हुए हैं; फिर धृतराष्ट्र से पूछते हैं कि वह उनसे क्या अभीष्ट चाहता है—देखना, स्पर्श करना या सुनना—जो भी हो, वे उसे पूर्ण करने को तत्पर हैं। → धृतराष्ट्र व्यास से कौन-सा वर/अनुभव माँगेगा—पुत्रों का दर्शन, सत्य का श्रवण, या आत्म-शान्ति का उपाय?
Verse 1
ऑपन-- मा बछ। -ज:डि अष्टाविशोब् ध्याय: महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठटिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु मॉगनेके लिये कहना वैशम्पायन उवाच ततः: समुपविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु । व्यास: सत्यवतीपुत्र इदं वचनमबत्रवीत्
वैशम्पायन बोले—जनमेजय! तत्पश्चात् महात्मा पाण्डवों के बैठ जाने पर सत्यवतीनन्दन व्यास ने यह वचन कहा।
Verse 2
धृतराष्ट्र महाबाहो कच्चित् ते वर्धते तप: । कच्चिन्मनस्ते प्रीणाति वनवासे नराधिप,“महाबाहु धृतराष्ट्र! तुम्हारी तपस्या बढ़ रही है न? नरेश्वर! वनवासमें तुम्हारा मन तो लगता है न?
महाबाहु धृतराष्ट्र! क्या तुम्हारी तपस्या बढ़ रही है? नरेश! क्या वनवास में तुम्हारा मन प्रसन्न रहता है?
Verse 3
कच्चिद् हृदि न ते शोको राजन पुत्रविनाशज: । कच्चिउज्ञानानि सर्वाणि सुप्रसन्नानि तेडनघ
राजन्! क्या पुत्र-विनाश से उत्पन्न शोक अब तुम्हारे हृदय में नहीं रहा? निष्पाप नरेश! क्या तुम्हारी समस्त इन्द्रियाँ और बुद्धि निर्मल व प्रसन्न हो गई हैं?
Verse 4
कच्चिद् बुद्धिंदृढां कृत्वा चरस्यारण्यकं विधिम् | कच्चिद् वधूश्न गान्धारी न शोकेनाभिभूयते
क्या तुम बुद्धि को दृढ़ करके वनवास के नियमों का आचरण करते हो? और क्या वधू गान्धारी शोक से अभिभूत नहीं होती?
Verse 5
महाप्रज्ञा बुद्धिमती देवी धर्मार्थदर्शिनी । आगमापायतत्त्वज्ञा कच्चिदेषा न शोचति
वैशम्पायन बोले—गान्धारी महाप्रज्ञा, बुद्धिमती और धर्म-अर्थ का यथार्थ दर्शन करनेवाली देवी है। वह आगमन-अपाय, अर्थात् जन्म-मरण के तत्त्व को जानती है; क्या वह फिर भी शोक नहीं करती?
Verse 6
कच्चित् कुन्ती च राजंस्त्वां शुश्रूषत्यनहंकृता । या परित्यज्य स्वं पुत्र गुरुशुश्रूषणे रता
वैशम्पायन बोले—राजन्! क्या कुन्ती अहंकाररहित होकर तुम्हारी सेवा-शुश्रूषा करती है? जो अपने पुत्रों तक को अलग रखकर गुरुजनों और वृद्धों की सेवा में लगी रहती है—क्या वह उसी विनय से तुम्हारी भी परिचर्या करती है?
Verse 7
कच्चिद् धर्मसुतो राजा त्वया प्रत्यभिनन्दित: । भीमार्जुनयमाश्वैव कच्चिदेतेडपि सान्त्विता:,“क्या तुमने धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरका अभिनन्दन किया है? भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवको भी धीरज बँधाया है?
वैशम्पायन बोले—क्या तुमने धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर का यथोचित अभिनन्दन किया? और क्या भीम, अर्जुन तथा यम के जुड़वाँ पुत्र—नकुल और सहदेव—इन सबको भी सांत्वना देकर धैर्य बँधाया?
Verse 8
कच्चिन्नन्दसि दृष्टवैतान् कच्चित् ते निर्मल मन: । कच्चिच्च शुद्धभावो5सि जातज्ञानो नराधिप
वैशम्पायन बोले—नराधिप! इन्हें देखकर क्या तुम प्रसन्न होते हो? क्या इनके कारण तुम्हारे मन की मलिनता दूर हो गई है? और क्या यथार्थ ज्ञान प्राप्त होने से तुम्हारे हृदय का भाव शुद्ध हो गया है?
Verse 9
एठद्धि त्रितयं श्रेष्ठ सर्वभूतेषु भारत । निर्वेरता महाराज सत्यमक्रोध एव च,“महाराज! भरतनन्दन! किसीसे वैर न रखना, सत्य बोलना और क्रोधको सर्वथा त्याग देना--से तीन गुण सब प्राणियोंमें श्रेष्ठ माने गये हैं
वैशम्पायन बोले—भरतनन्दन, महाराज! समस्त प्राणियों में यह त्रय श्रेष्ठ माना गया है—निर्वैरता, सत्यवचन और क्रोध का सर्वथा त्याग।
Verse 10
कच्चित् ते न च मोहो5स्ति वनवासेन भारत । स्ववशे वन्यमन्नं वा उपवासोडपि वा भवेत्
भारत! वनवास से तुम्हें कहीं मोह या विषाद तो नहीं होता? चाहे वन में उत्पन्न अन्न तुम्हारे वश में रहे या तुम्हें उपवास ही करना पड़े—क्या यह वन-जीवन तुम्हारे मन को विचलित तो नहीं करता?
Verse 11
विदितं चापि राजेन्द्र विदुरस्य महात्मन: । गमनं विधिनानेन धर्मस्य सुमहात्मन:,'राजेन्द्र! महात्मा विदुरके, जो साक्षात् महामना धर्मके स्वरूप थे, इस विधिसे परलोकगमनका समाचार तो तुम्हें ज्ञात हुआ ही होगा
राजेन्द्र! महात्मा विदुर का—जो साक्षात् महामना धर्मस्वरूप थे—इसी विधि से परलोकगमन हुआ, यह वृत्तान्त तुम्हें अवश्य ज्ञात होगा।
Verse 12
माण्डव्यशापाद्धि स वै धर्मो विदुरतां गत: । महाबुद्धिर्महायोगी महात्मा सुमहामना:,“माण्डव्य मुनिके शापसे धर्म ही विदुररूपमें अवतीर्ण हुए थे। वे परम बुद्धिमान, महान् योगी, महात्मा और महामनस्वी थे
माण्डव्य मुनि के शाप से धर्म ही विदुर-रूप को प्राप्त हुए थे। वे परम बुद्धिमान, महान् योगी, महात्मा और अत्यन्त महामनस्वी थे।
Verse 13
बृहस्पतिर्वा देवेषु शुक्रो वाप्पसुरेषु च | न तथा बुद्धिसम्पन्नो यथा स पुरुषर्षभ:,“देवताओंमें बृहस्पति और असुरोंमें शुक्राचार्य भी वैसे बुद्धिमान नहीं हैं, जैसे पुरुषप्रवर विदुर थे
देवताओं में बृहस्पति और असुरों में शुक्राचार्य भी उतने बुद्धिसम्पन्न नहीं हैं, जितने पुरुषश्रेष्ठ विदुर थे।
Verse 14
तपोबलव्ययं कृत्वा सुचिरात् सम्भृतं तदा । माण्डव्येनर्षिणा धर्मो ह्भिभूत: सनातन:,“माण्डव्य ऋषिने चिरकालसे संचित किये हुए तपोबलका क्षय करके सनातन धर्मदेवको (शाप देकर) पराभूत किया था
तब माण्डव्य ऋषि ने चिरकाल से संचित तपोबल का व्यय करके (शाप देकर) सनातन धर्मदेव को पराभूत कर दिया था।
Verse 15
नियोगाद् ब्रह्मण: पूर्व मया स्वेन बलेन च । वैचित्रवीर्यके क्षेत्रे जात: स सुमहामति:
वैशम्पायन बोले—पूर्वकाल में ब्रह्मा की आज्ञा से और अपने तपोबल के प्रभाव से मैंने वैचित्रवीर्य की पत्नी के क्षेत्र में उस परम बुद्धिमान विदुर को उत्पन्न किया था।
Verse 16
भ्राता तव महाराज देवदेव: सनातन: । धारणान्मनसा ध्यानाद् यं धर्म कवयो विदु:
वैशम्पायन बोले—महाराज! तुम्हारे भाई देवों के भी देव, सनातन हैं। धारण, मन की एकाग्रता और ध्यान के द्वारा जिन्हें कविजन ‘धर्म’ के रूप में जानते हैं।
Verse 17
“महाराज! तुम्हारे भाई विदुर देवताओंके भी देवता सनातन धर्म थे। मनके द्वारा धर्मका धारण और ध्यान किया जाता है, इसलिये विद्वान् पुरुष उन्हें धर्मके नामसे जानते हैं ।।
वैशम्पायन बोले—महाराज! तुम्हारे भाई विदुर देवताओं के भी देव, सनातन धर्म थे। मन के द्वारा धर्म का धारण और ध्यान किया जाता है, इसीलिए विद्वान उन्हें ‘धर्म’ नाम से जानते हैं। जो सत्य, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, अहिंसा और दान के रूप में साधित होकर जगत के कल्याण और उन्नति का कारण बनता है—वह सनातन धर्म विदुर से भिन्न नहीं है।
Verse 18
येन योगबलाज्जात: कुरुराजो युधिष्ठिर: । धर्म इत्येष नृपते प्राज्ञेनामितबुद्धिना,“जिस अमित बुद्धिमान् और प्राज्ञ देवताने योगबलसे कुरुराज युधिष्ठिरको जन्म दिया था, वह धर्म विदुरका ही स्वरूप है
वैशम्पायन बोले—नृपते! जिनकी योगशक्ति से कुरुराज युधिष्ठिर उत्पन्न हुए, वही धर्म हैं—वे प्राज्ञ देवता, अमित बुद्धि वाले।
Verse 19
यथा वल्लिययथा वायुर्यथा55प: पृथिवी यथा। यथा55काशं तथा धर्म इह चामुत्र च स्थित:,'जैसे अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाशकी सत्ता इहलोक और परलोकमें भी है, उसी प्रकार धर्म भी उभय लोकमें व्याप्त है
वैशम्पायन बोले—जैसे अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश—इनकी सत्ता इहलोक और परलोक दोनों में है, वैसे ही धर्म भी यहाँ और वहाँ दोनों लोकों में स्थित और व्याप्त है।
Verse 20
सर्वगश्नैव राजेन्द्र सर्व व्याप्प चराचरम् | दृश्यते देवदेवै: स सिद्धेर्निर्मुक्तकल्मषै:
वैशम्पायन बोले—राजेन्द्र! धर्म सर्वत्र ही गति करता है; वह समस्त चराचर जगत् को व्याप्त करके सर्वत्र स्थित है। उसका यथार्थ दर्शन केवल देवों के देव और वे सिद्ध पुरुष करते हैं जिनके कल्मष पूर्णतः धुल चुके हैं; पापमुक्त जन ही धर्म की सर्वव्यापिनी गति को प्रत्यक्ष जान पाते हैं।
Verse 21
यो हि धर्म: स विदुरो विदुरो य: स पाण्डव: । स एष राजन दृश्यस्ते पाण्डव: प्रेष्यवत् स्थित:
वैशम्पायन बोले—जो धर्म है वही विदुर था, और जो विदुर था वही यह पाण्डव है। राजन्, देखो—यह पाण्डव इस समय तुम्हारे सामने सेवक की भाँति खड़ा है।
Verse 22
प्रविष्ट: स महात्मान भ्राता ते बुद्धिसत्तम: । दृष्टवा महात्मा कौन्तेयं महायोगबलान्वित:
तुम्हारे भाई, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ महात्मा विदुर, महान् योगबल से सम्पन्न होकर कौन्तेय युधिष्ठिर को सामने देखकर उनके ही शरीर में प्रविष्ट हो गये।
Verse 23
त्वां चापि श्रेयसा योक्ष्ये न चिराद् भरतर्षभ । संशयच्छेदनार्थाय प्राप्तं मां विद्धि पुत्रक
भरतश्रेष्ठ! तुम्हें भी मैं शीघ्र ही कल्याण से जोड़ दूँगा। पुत्र! जानो, मैं तुम्हारे संशयों का छेदन करने के लिये ही यहाँ आया हूँ।
Verse 24
न कृतं यै: पुरा कैश्वित् कर्म लोके महर्षिभि: । आश्चर्यभूतं तपस: फलं तद् दर्शयामि व:
पूर्वकाल में किसी महर्षि ने संसार में जो आश्चर्यपूर्ण कर्म नहीं किया था, वह भी आज मैं कर दिखाऊँगा। आज मैं तुम्हें अपनी तपस्या का अद्भुत फल दिखलाता हूँ।
Verse 25
किमिच्छसि महीपाल मत्तः प्राप्तुमभीष्सितम् | द्रष्ट स्प्रष्टमथ श्रीतुं तत्कर्ताउस्मि तवानघ
वैशम्पायन बोले— हे निष्पाप महीपाल! बताओ, तुम मुझसे कौन-सा अभीष्ट वर पाना चाहते हो? किसे देखना, स्पर्श करना अथवा सुनना चाहते हो? मैं तुम्हारी वह इच्छा पूर्ण कर दूँगा।
Verse 27
इस प्रकार श्रीमह्ााभारत आश्रमवासिकपरव्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें व्यासका आगमनविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के आश्रमवासिकपर्व के अन्तर्गत आश्रमवासपर्व में व्यासजी के आगमन-विषयक सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 28
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि व्यासवाक्ये अष्टाविंशोडध्याय:
इस प्रकार श्रीमहाभारत के आश्रमवासिकपर्व में, आश्रमवासपर्व के अन्तर्गत, व्यास-वाक्य नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
The chapter addresses epistemic and moral accounting: how Dhṛtarāṣṭra’s future condition is to be understood within karma—what remains of his life, what purification austerity effects, and which posthumous realm corresponds to his disciplined renunciation.
Austerity and disciplined withdrawal are depicted as mechanisms of moral clarification: tapas can reduce accumulated impurity, and destiny is presented as structured, knowable through authorized discourse linking human conduct to cosmological outcomes.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary is implicit in Nārada’s framing of the account as “devaguhya” (a divine secret) and in the audience’s satisfaction, signaling the narrative’s function as authoritative closure regarding Dhṛtarāṣṭra’s gati.