Puṣkara-Śapatha Itihāsa (Agastya–Indra Dispute at the Tīrthas) | पुष्कर-शपथ-आख्यानम्
यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् | नैतद् धारयितुं शक््यं गच्छावतर पद्मिनीम्
यातुधानी बोली—मुनिवर! आपके नाम का यह निरुक्त भी मुझे दुःख से उच्चरित होने वाले अक्षरों-सा प्रतीत होता है; मैं इसे धारण नहीं कर सकती। जाइए—कमलों से भरे सरोवर में उतरिए।
भरद्वाज उवाच