Puṣkara-Śapatha Itihāsa (Agastya–Indra Dispute at the Tīrthas) | पुष्कर-शपथ-आख्यानम्
वर्षाचरो<स्तु भृतको राज्ञश्नास्तु पुरोहित: । अयाज्यस्य भवेदृत्विग् बिसस्तैन्यं करोति यः:
विश्वामित्र बोले—जो मृणाल (बिस) चुराए, वह वर्षाकाल में परदेश-गामी हो; ब्राह्मण होकर वेतन लेकर सेवा करने वाला हो; राजा का अन्न खाने वाला पुरोहित हो; और यज्ञ के अनधिकारी के लिए भी ऋत्विज बने।
विश्वामित्र उवाच