अनुशासनपर्व अध्याय ९३ — तपस्, सदोपवास, विघसाशन, अतिथिप्रियता
Austerity, regulated fasting, residual-eating, and hospitality
ऋतच्विग्भिर भ्यनुज्ञात: पंक््त्या हरति दुष्कृतम् जो ऋत्विक् या अध्यापक न हो, वह भी यदि ऋत्विजोंकी आज्ञा लेकर श्राद्धमें अग्रासन ग्रहण करता है तो पंक्तिके दोषको हर लेता है अर्थात् दूर कर देता है ।।
ṛtacvigbhir abhyanujñātaḥ paṅktyā harati duṣkṛtam | yo ṛtvij vā adhyāpako na bhavati sa api yadi ṛtvijāṁ ājñāṁ gṛhītvā śrāddhe agrāsanaṁ gṛhṇāti tarhi sa paṅktidoṣaṁ harati (dūrīkaroti) || atha ced vedavit sarvaḥ paṅktidoṣair avivarjitaḥ ||
ऋत्विजों की अनुमति से यदि वह (जो न ऋत्विक है न अध्यापक) श्राद्ध में पंक्ति के अग्रासन पर बैठता है, तो पंक्ति का दोष हर लेता है, अर्थात् दूर कर देता है। और यदि वह वेदवित् हो तथा पंक्ति-दोषों से रहित हो,
भीष्म उवाच