Chapter 85: Suvarṇasya Janma ca Pradāna-Phalam
The Origin of Gold and the Merit of Gifting
श्रीझ्वाच अवज्ञाता भविष्यामि सर्वलोकस्य मानदा: । प्रत्याख्यानेन युष्माकं प्रसाद: क्रियतां मम
śrīr uvāca—avajñātā bhaviṣyāmi sarvalokasya mānadāḥ | pratyākhyānena yuṣmākaṃ prasādaḥ kriyatāṃ mama ||
श्री (लक्ष्मी) ने कहा— हे दूसरों को मान देनेवाली गौओ! यदि तुम मुझे ठुकरा दोगी, तो मैं समस्त लोक में अवज्ञात और उपेक्षित हो जाऊँगी। इसलिए मुझ पर प्रसन्न होओ, मुझ पर कृपा करके मुझे स्वीकार करो।
भीष्म उवाच