Nṛga-upākhyāna: Brāhmaṇa-sva and the Consequence of Misappropriated Gift-Cattle (कृकलास-रूपे नृगोपाख्यानम्)
तदभूमिं वापि पितृभि: श्राद्धकर्म विहन्यते । जो परायी भूमिमें पितरोंके लिये श्राद्ध करता है, अथवा जो उस भूमिको पितरोंके लिये दानमें देता है, उसके वे श्राद्धकर्म और दान दोनों ही नष्ट होते (निष्फल हो जाते) हैं ।।
जो परायी भूमि में पितरों के लिए श्राद्ध करता है, अथवा जो उसी भूमि को पितरों के निमित्त दान में देता है, उसका श्राद्धकर्म और दान—दोनों निष्फल हो जाते हैं। इसलिए बुद्धिमान पुरुष थोड़ी-सी भी भूमि खरीदकर ही दान दे।
भीष्म उवाच