Pānīya-dāna and Anna-dāna: The Primacy of Life-Sustaining Gifts (पानीयदान-प्रशंसा / अन्नदान-प्रशंसा)
ब्राह्मणो हि महदभूतं स्वयं देहीति याचति । अकामो वा सकामो वा दत्त्वा पुण्यमवाप्रुयात्
ब्राह्मण महान् प्राणी है। यदि वह स्वयं ‘मुझे अन्न दो’ कहकर याचना करे, तो मनुष्य को चाहिए कि निष्काम भाव से या सकाम भाव से उसे अन्नदान करके पुण्य प्राप्त करे।
नारद उवाच