Cyavana’s Yogic Display and Kuśika’s Recognition of Tapas (च्यवन-योगप्रभावः कुशिकस्य तपःप्रशंसा च)
नह॒ष उवाच सहस्र॑ं दीयतां मूल्यं निषादेभ्य: पुरोहित | निष्क्रयार्थे भगवतो यथा55ह भृगुनन्दन:
नहुष ने अपने पुरोहित से कहा—पुरोहितजी! भृगुनन्दन च्यवन मुनि की आज्ञा के अनुसार, इन निषादों (मल्लाहों) को भगवन् के निष्क्रयार्थ एक हजार मुद्राएँ मूल्यरूप में दे दीजिए।
नह॒ष उवाच