Cyavana’s Water-Vow and the Ethics of Cohabitation (स्नेह-सम्वास-धर्मः)
वक्षित्तु संशयो मे5स्ति तन्मे ब्रूहि पितामह । जाते5स्मिन् संशये राजन् नान्यं पृच्छेम कंचन
yudhiṣṭhira uvāca |
vakṣituṁ saṁśayo me 'sti tan me brūhi pitāmaha |
jāte 'smin saṁśaye rājan nānyaṁ pṛcchema kañcana ||
युधिष्ठिर बोले—पितामह! मेरे मन में एक संशय है, उसे मैं प्रकट करना चाहता हूँ; आप ही उसका उत्तर बताइए। राजन्! यह संशय उत्पन्न होने पर मैं इसके विषय में किसी और से नहीं पूछूँगा।
युधिछिर उवाच