पात्रलक्षण-परिक्षा (Pātra-Lakṣaṇa Parīkṣā) — Criteria for a Worthy Recipient
ब्राह्मणके मुखसे जो वाणी निकलती है, उसे जो शिरोधार्य करते हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंको आत्मभावसे देखनेवाले महात्मा कभी पराभवको नहीं प्राप्त होते हैं ।।
bhīṣma uvāca | brāhmaṇake mukhase yo vāṇī nikalatī hai, use yo śirodhārya karate haiṃ, ve sampūrṇa bhūtoṃ ko ātmabhāvase dekhanevāle mahātmā kabhī parābhavako nahīṃ prāpta hote haiṃ || kṣatriyāṇāṃ pratapatāṃ tejasā ca balena ca | brāhmaṇeṣv eva śāmyanti tejāṃsi ca balāni ca ||
ब्राह्मण के मुख से जो वाणी निकलती है, उसे जो शिरोधार्य मानकर हृदय में धारण करते हैं, वे आत्मभाव से समस्त प्राणियों को देखने वाले महात्मा कभी पराभव को नहीं प्राप्त होते। क्योंकि तेज और बल से दहकते हुए क्षत्रियों का तेज और बल भी ब्राह्मणों के समीप आते ही वहीं शान्त हो जाता है; वहीं उनकी उग्र शक्ति का निग्रह होता है।
भीष्म उवाच