मातङ्ग–शक्रसंवादः
Mataṅga–Śakra Dialogue on Tapas, Status, and Moral Qualities
वर्णाश्रमा यथा सर्वे धर्मज्ञानविवर्जिता: । क्रतवश्चन॒ यथासोमास्तथा गड़ां विना जगत्
जैसे धर्म और ज्ञान से रहित होने पर समस्त वर्ण और आश्रम शोभा नहीं पाते, और जैसे सोमरस के बिना यज्ञ सुशोभित नहीं होते, वैसे ही गदा के बिना जगत् की शोभा नहीं है।
सिद्ध उवाच