मातङ्ग–शक्रसंवादः
Mataṅga–Śakra Dialogue on Tapas, Status, and Moral Qualities
वैशम्पायन उवाच कथान्ते शिरसा पादौ स्पृष्टवा भीष्मस्य पाण्डव: । धर्म्य धर्मसुतः प्रश्न॑ पर्यपृच्छद् युधिष्ठिर:
वैशम्पायन बोले—जनमेजय! कथा के अंत में पाण्डव धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने भीष्म के चरणों में सिर रखकर, धर्म के अनुरूप यह प्रश्न किया।
वैशम्पायन उवाच