मातङ्ग–शक्रसंवादः
Mataṅga–Śakra Dialogue on Tapas, Status, and Moral Qualities
वैशम्पायन उवाच श्रुत्वेतिहासं भीष्मोक्तं गज़ाया: स्तवसंयुतम् । युधिष्ठिर: परां प्रीतिमगच्छद् भ्रातृभि: सह
वैशम्पायनजी बोले—जनमेजय! भीष्मजी द्वारा कही हुई, गंगाजी की स्तुति से युक्त इस कथा-इतिहास को सुनकर राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों सहित अत्यन्त प्रसन्न हुए।
वैशम्पायन उवाच