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Mahabharata — Anushasana Parva, Shloka 81

तीर्थवंशोपदेशः

Tīrtha-vaṃśa Upadeśa: Instruction on the Fruits of Sacred Waters

(संश्रुत्य चाप्रदातारो दरिद्राणां विनिन्दका: । श्रोत्रियाणां विनीतानां दरिद्राणां विशेषत: ।।

जो देने की प्रतिज्ञा करके भी नहीं देते, दरिद्रों की—विशेषकर विनयशील निर्धन श्रोत्रियों की—और क्षमाशीलों की निन्दा करते हैं, वे निश्चय ही नरकगामी होते हैं। और जो अपना प्रयोजन सिद्ध हो जाने पर दीर्घकाल तक साथ रहे क्षमाशील, जितेन्द्रिय, बुद्धिमान जनों का त्याग कर देते हैं, वे भी नरक में गिरते हैं।

भीष्म उवाच