तीर्थवंशोपदेशः
Tīrtha-vaṃśa Upadeśa: Instruction on the Fruits of Sacred Waters
आशीौचो ब्राह्मणो राजन् यो+श्रीयाद् ब्राह्मणादिषु । ज्ञानपूर्वमथो लोभात् तस्याधर्मो गवानृतम्
राजन्! जो ब्राह्मण अपने घर में अशौच रहते हुए भी लोभवश जान-बूझकर दूसरे ब्राह्मण आदि के यहाँ श्राद्ध का अन्न ग्रहण करता है, उसे भी गौ की झूठी शपथ खाने के समान पाप लगता है।
भीष्म उवाच