Aṣṭāvakra’s Visit to Kubera: Hospitality, Temptation, and the Ethics of Restraint (अष्टावक्र-वैश्रवणोपाख्यानम्)
न ते संसारवशगा इति मे निश्चिता मति: । ततः कृष्णो<ब्रवीद् वाक््यं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम्
“वे संसार के वश में नहीं होते”—यह मेरा निश्चित मत है। तब श्रीकृष्ण ने धर्मपुत्र युधिष्ठिर से वचन कहा।
वायुदेव उवाच