Aṣṭāvakra’s Visit to Kubera: Hospitality, Temptation, and the Ethics of Restraint (अष्टावक्र-वैश्रवणोपाख्यानम्)
अचिन्त्य एष भगवान् कर्मणा मनसा गिरा । न मे तात युधिश्रेष्ठ विद्यया पण्डित: सम:
तात! रणभूमि के श्रेष्ठ वीर! ये अचिन्त्य भगवान् शिव मन, वाणी और कर्म से आराध्य हैं। उनकी आराधना का ही यह फल है कि विद्या में मेरी समानता करने वाला आज कोई पण्डित नहीं है।
वैशम्पायन उवाच