Śiva-stavarāja: Upamanyu’s Preface and Initiation of the Śarva-Nāma Enumeration
Anuśāsana-parva 17
त्रिलोचनो विषण्णाड्रो मणिविद्धों जटाधर: । बिन्दुर्विसर्ग: सुमुख: शर: सर्वायुध: सह:
trilocano viṣaṇṇāḍro maṇividdho jaṭādharaḥ | bindur visargaḥ sumukhaḥ śaraḥ sarvāyudhaḥ sahaḥ ||
वायु-देव ने कहा—वह त्रिनेत्रधारी है; सर्वथा निराकार, अंगरहित है; मणिमय आभूषणों हेतु छिदे हुए कर्णों वाला, जटाधारी है। वह ‘बिन्दु’ और ‘विसर्ग’ है; सुन्दर मुख वाला है; स्वयं बाणस्वरूप है; समस्त आयुधों से युक्त है; और सहनशील है।
वायुदेव उवाच