अध्याय १६ — शङ्कर-उमा-वरदानम् तथा तण्डि-स्तुतिः (Śaṅkara–Umā Boon-Granting and Taṇḍi’s Hymn)
कालाख्य: पुरुषाख्यश्ष ब्रह्माख्यश्न त्वमेव हि । तनवस्ते स्मृतास्तिस््र: पुराणज्ञै: सुर्िभि:
kālākhyaḥ puruṣākhyaś ca brahmākhyaś ca tvam eva hi | tanavas te smṛtās tisraḥ purāṇajñaiḥ surarṣibhiḥ ||
वायु ने कहा—काल, पुरुष और ब्रह्म—इन तीन नामों से वास्तव में आप ही कहे जाते हैं। पुराणों के ज्ञाता देवर्षियों ने आपके ये तीन रूप बताए हैं।
वायुदेव उवाच