Pratyakṣa–Āgama–Ācāra: Doubt, Proof, and the Practice of Dharma (प्रत्यक्ष–आगम–आचारविचारः)
तेषामपि विधिं पुण्यं श्रोतुमिच्छामि शड्कर । वानप्रस्थेषु देवेश स्वशरीरोपजीविषु
हे शंकर! देवेश! जो वानप्रस्थ अपने ही शरीर को कष्ट देकर जीवन-निर्वाह करते हैं, उनके लिए जो पवित्र विधि (नियम-कर्तव्य) है, उसे भी मैं सुनना चाहती हूँ।
श्रीमहेश्वर उवाच