Rudra-Śiva: Names, Two Natures, and the Logic of Epithets (रुद्रनाम-बहुरूपत्व-प्रकरणम्)
(पुरा युगान्तरे यत्नादमृतार्थ सुरासुरै: । बलवद्धिविमथितश्चिरकालं महोदधि: ।।
purā yugāntare yatnād amṛtārthaṁ surāsuraiḥ | balavaddhi vimathitaś cirakālaṁ mahodadhiḥ ||
महेश्वर ने कहा— प्राचीन युगान्तर में देवता और असुर अमृत की प्राप्ति के लिए महान् प्रयास करते हुए चिरकाल तक महासागर का मन्थन करने लगे। वासुकि नागराज की रस्सी से बँधे मन्दराचल रूपी मथानी से जब समुद्र मथा गया, तब वहाँ से समस्त लोकों का विनाश करने वाला विष प्रकट हुआ। उसे देखकर सब देवता विषण्ण हो गए; तब लोकहित के लिए मैंने स्वयं उस विष को पी लिया। शुभे! उसी से मेरे कण्ठ में मयूरपंख के समान नील चिह्न बन गया और तभी से मैं ‘नीलकण्ठ’ कहलाया। यह सब मैंने तुम्हें कह दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो? उमा बोली— सर्वलोकसुखावह नीलकण्ठ! आपको नमस्कार। देवदेवेश! बहुत-से आयुधों के होते हुए भी आप पिनाक को ही क्यों धारण करना चाहते हैं? कृपा कर बताइए। महेश्वर ने कहा— धर्मानुकूल शस्त्र-प्राप्ति का वृत्तान्त सुनो, पवित्र मुसकानवाली। युगान्तर में कण्व नामक महामुनि ने दिव्य तपस्या आरम्भ की। घोर तप करते-करते कालक्रम से उनके मस्तक पर बाँबी जम गई, फिर भी वे तप में लगे रहे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा वर देने आए; वर देकर उन्होंने वहाँ एक बाँस देखा और लोककार्य के लिए उसे धनुष के रूप में नियोजित किया। विष्णु और मेरी शक्ति जानकर लोकपितामह ने दो धनुष दिए— मेरे लिए ‘पिनाक’ और हरि के लिए ‘शार्ङ्ग’; शेष भाग से तीसरा ‘गाण्डीव’ बना। उसे सोम को देकर ब्रह्मा अपने लोक चले गए। अनिन्दिते! शस्त्र-प्राप्ति का यह सब वृत्तान्त मैंने कह दिया। उमा ने पूछा— महादेव! अन्य सुन्दर वाहनों के होते हुए भी वृषभ ही आपका वाहन कैसे बना?
श्रीमहेश्वर उवाच
The verse frames a moral pattern: great attainments (amṛta) require sustained effort and may demand cooperation even between opponents; yet the pursuit of a lofty goal can first release dangers, implying the need for guardianship and self-sacrifice to protect the common good.
Mahādeva begins recounting the ancient episode of the churning of the ocean: devas and asuras jointly churn the great ocean for a long time to obtain amṛta, setting up the later emergence of poison and Śiva’s protective act.