Sāma (Sāntva) and Dāna: The Brāhmaṇa’s Conciliatory Release from a Rākṣasa
मैत्रेय उवाच निर्दोष निर्मल चैवं वचनं दानसंहितम् । विद्यातपो भ्यां हि भवान् भावितात्मा न संशय:
मैत्रेय बोले—मुने! दान के सम्बन्ध में आपने जो वचन कहे हैं, वे दोषरहित और निर्मल हैं। इसमें संदेह नहीं कि आपने विद्या और तपस्या से अपने अन्तःकरण को संस्कारित कर परम पवित्र बना लिया है।
मैत्रेय उवाच