Adhyāya 122 — Śruta-vṛtta-yukta Brāhmaṇa and the Ethics of Dāna
Maitreya–Vyāsa Saṃvāda
व्यास उवाच अर्चितो5हं त्वया राजन् वाम्भिरद्य यदृच्छया । अद्य ते कीटतां प्राप्य स्मृतिर्जाता जुगुप्सिता
व्यासजी ने कहा— राजन्! आज तुमने अपनी वाणी से मेरा यथोचित स्तवन किया है। पर कीट-योनि को प्राप्त होने पर भी तुम्हारे भीतर वह घृणित स्मृति—मांसभक्षण की प्रवृत्ति—अब तक बनी हुई है।
व्यास उवाच