Kīṭopākhyāna: Prajā-pālana as Kṣatra-vrata and the Attainment of Brāhmaṇya
कुम्भीपाके च पच्यन्ते तां तां योनिमुपागता: । आक्रम्य मार्यमाणाश्ष भ्राम्यन्ते वै पुन: पुन:
वे अपने पापों के कारण कुम्भीपाक नरक में राँधे जाते हैं; फिर भिन्न-भिन्न योनियों में जाकर बार-बार दबोचकर मारे जाते हैं—इस प्रकार वे पुनः पुनः संसार-चक्र में भटकते रहते हैं।
भीष्म उवाच