Ahiṃsā as Threefold Restraint (Mind–Speech–Action) and the Ethics of Consumption
दधि हृत्वा बकश्नापि प्लवो मत्स्यानसंस्कृतान् | चोरयित्वा तु दुर्बुद्धिर्मधु दंश: प्रजायते
दही चुराकर दुर्बुद्धि मनुष्य बगला होता है; कच्ची मछलियाँ चुराकर वह प्लव (कारण्डव) नामक जलपक्षी बनता है; और मधु चुराकर वह डाँस (मच्छर) की योनिमें जन्म लेता है।
युधिछिर उवाच