Ahiṃsā as Threefold Restraint (Mind–Speech–Action) and the Ethics of Consumption
मातापितरावाक़ुश्य सारिक: सम्प्रजायते । ताडयित्वा तु तावेव जायते कच्छपो नृूप
mātāpitarāv ākruśya śārikaḥ samprajāyate | tāḍayitvā tu tāv eva jāyate kacchapo nṛpa ||
युधिष्ठिर बोले—जो मनुष्य माता-पिता की निन्दा करता है या उन्हें गाली देता है, वह अगले जन्म में मैना होता है। नरेश्वर! जो उन्हीं माता-पिता को मारता है, वह कछुआ बनता है।
युधिछिर उवाच