अहिंसा-आत्मौपम्य-उपदेशः | Instruction on Ahiṃsā and Self-Comparison Ethics
भरण्यां तु शिरो विद्यात् केशाना्द्रां नराधिप । समाप्ते तु घृतं दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे
bharaṇyāṃ tu śiro vidyāt keśānārdraṃ narādhipa | samāpte tu ghṛtaṃ dadyād brāhmaṇe vedapārage ||
भीष्म बोले—नराधिप! भरणी को सिर और आर्द्रा को (चन्द्रमा के) केश समझो। इस प्रकार नक्षत्रों की विभिन्न अंगों में स्थापना करके उनके-उन मंत्रों से पूजा करते हुए प्रतिदिन जप-होम आदि करे। पौर्णमासी को व्रत की समाप्ति पर वेदों के पारंगत ब्राह्मण को घृत दान करे।
भीष्म उवाच